प्रेत-छाया
पिक्चर्स वेन दे आर शट,’ (मेरी आँखें चित्र बनाती हैं जब वे बंद होती हैं) कोलरिज
ने एक जगह कहा था|
रहे होंगे?
के?
इंद्रजाल रहे? बिना किसी वास्तविक आधार के? बिना अस्तित्व के?
आह्वान पर प्रकट हुए रहे?
जिनके बिंब-प्रतिबिंब चित्त में अंकित किसी देखी-अनदेखी ने सचित्र किए?
पाँच अवस्थाएँ हैं : क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र एवं निरुद्ध| मैं नहीं
जानता, मेरा चित्त आजकल कौन-सी अवस्था से गुजर रहा है, किंतु निस्संदेह सत्तासी
वर्ष की अपनी इस आयु में जिंदगी मेरे साथ पाँव घसीटकर चल रही है…..
भी लगाएगी, मैं जानता हूँ…..
मेरा निवाला, मेरा श्वास बीच में रोक देगी और पारलौकिक उस विभ्रंश घाटी में मुझे
ले विचरेगी जहाँ समय का हिसाब नहीं रखा जाता….. किन्हीं भी लकीरों में पड़े बिंदु
अपनी-अपनी जगह छोड़कर एक ही दायरे में आगे-पीछे घूम सकते हैं, घूम लेते हैं…..
न थी, क्या वह हवा की सीटी थी?
उन्नीस सौ अट्ठाईस की उस दोपहर मेरे पिताने मुझे पुकारा है…..
अपने चेचक के कारण मेरा डेरा चौथी मंजिल की सीढ़ियों की छत के भुज-विस्तार के
अंतर्गत बनी बरसाती में है, जिसकी एक खिड़की इस चौमंजिली इमारतकी छत के सीखचों से
दो फुट की दूरी पर खुलती है| खिड़की से तीसरी मंजिल के आँगन में खड़े व्यक्ति से
वार्तालाप स्पष्ट और सहज किया जा सकता है…..
जी ही रोज दोपहर में मेरी नाड़ी देखकर तय करते हैं, मुझे बुखार है या नहीं|’
पाएँगे| बाहर खलबली है| सड़क पर जुलूस आ रहा है|’
हैं, सन् उन्नीस सौ उन्नीस के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट द्वारा स्थापित भारतीय संविधान की कार्यप्रणाली पर रिपोर्ट तैयार
करने हेतु स्टेनले बाल्डविन की कंजरवेटिव ब्रिटिश सरकार ने नवंबर उन्नीस सौ सत्ताईस
में एक दल का संगठनकिया था, जिसका नाम था- साइमन कमीशन| इसमें सात सदस्य नामित किए
गए थे : चार कंजरवेटिव पार्टी के, दो लेबर पार्टी के और एक लिबरल पार्टी का|
प्रधानमंत्री भी रहे| इस कमीशन को भारत का दौरा करने के बाद ही अपनी रिपोर्ट देनी
थी किंतु जब यह दल हमारे देश में आया तो कांग्रेस पार्टी समेत कई राजनीतिक
पार्टियों ने इसका जमकर विरोध किया था| सभी को आपत्ति थी कि इस कमीशन में एक भी
भारतीय क्यों नहीं रखा गया था? फलस्वरूप जहाँ-जहाँ यह दल अपनी रिपोर्ट के लिए
सामग्री एकत्रित करने जाता वहाँ-वहाँ काली झंडियों के साथ नारे लगाए जाते- ‘गोबैक
साइमन, गो बैक…..’
कस्बापुर में आया है…..
शोर क्यों न हो, मुँडेर पर मत जाना| भीड़ को तितर-बितर करने के वास्ते पुलिस हथगोले
फेंक सकती है, गैस छोड़ सकती है, गोली चला सकती है…..’
तुम्हारे लिए एक पुड़िया भेजी है, खिलावन के हाथ| तुम्हारे पास भेज रहा हूँ| पानी
के घोल में इसे पी जाना…..’
मुझे इसी खिलावन के हाथ यहीं चौथी मंजिल पर भेजा जाता था| अपने चेचक के कारण पहली
मंजिल वाला मेरा कमरा मुझसे छूट गया था| मेरे पिता कपड़े के थोक व्यापारी थे और भू-तल
वाली मंजिल के अगले आधे हिस्से में अपनी दुकान खोले थे और पिछले आधे हिस्से में
अपना गोदाम रखे थे| पहली मंजिल पर मेरे दादा के और मेरे कमरे के अलावा बैठक थी और
मंदिर था|
अपनी पाँच बेटियों के साथ अड्डा जमाए थीं| छूत के डर से उन्हीं ने मेरा कमरा मुझसे
छुड़वा रखा था| खाना मुझे खिलावन की निगरानी में खिलाया जाता| शुरू में मैंने
खिलावन से कहा भी कि वह खाना रखकर चला जाए, मैं थोड़ी देर में खा लूँगा, लेकिन
खिलावन ने सिर हिला दिया, ‘हमें ऐसा हुक्म नहीं| बहूजी कहती हैं, आपके खाने के समय
हमें आपके पास खड़े रहना है|’ हाँ, कितना मैं खाता या न खाता, इससे उसे कुछ
लेना-देना न रहता| जैसे ही मैं उसकी ओर अपनी थाली बढ़ाता, हाथ बढ़ाकर वह थाली लेता
और वापस चला जाता|
की ओर लपक लेता हूँ…..
बैक,’ ढेरों नारे हवा में गूँज रहे हैं…..
एक मेघ-गर्जन ऊपर मेरी मुँडेर पर धुँधुआता है….. अंधाधुंध मेरे गिर्द फिरकता है…..
पार नीर जमा करने लगता है…..
ग्यारहवें दिन के पोले उभार टीस मारकर टपकने लगते हैं…..
मेरी आँखों की तरह बह रहे हैं…..
चुने गए तराशीदार पत्थर की ओट में मैं बैठ लेता हूँ…..
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| नीला दुपट्टा |
एक नीला दुपट्टा अंधी हो रही मेरी आँखों के सामने लहराता है…..
उठती है…..
है…..
बैक….. तब यह मुँडेर न थी…..’
आँखें मुलमुलाता हूँ…..
मेरे पिता ने दूसरी शादी की थी तो मेरी सौतेली माँ के साहूकार पिता ने शादी की एक
ही शर्त रखी थी, अपनी छत पर पहले चार फीट ऊँची और डेढ़ फीट चौड़ी चौहद्दी मुँडेर
खड़ी करवा लो…..
क्या यह नीचे की भीड़ की ध्वनि की प्रतिध्वनि है?
कौन कदम धब-धब ऊपर आ रहे हैं?
नहीं सकती थी तो उसे साथ लेकर गई ही क्यों?’ मेरे पिता चिल्ला रहे हैं…..
क्या सुनी रही मैंने यही चिल्लाहट?
खुली छत से नीचे जा गिरी रही…..
पर्व रहा और देवी-दर्शन के लिए जाई के साथ बहन और मैं जल्दी ही एक रेले का भाग बन
गए रहे….. जाई ने हम दोनों के हाथ कसकर पकड़े रहे, लेकिन रेले में से किसी ने बहन
का हाथ माँ के हाथ से जबरन छुड़ा दिया रहा….. कई खुले दरवाजों की कई खुली दहलीजों
पर जाई और मैं लौट-लौट गए रहे, नमन कर रहे कितने ही शीर्षों और हाथों से बचते हुए,
कितने ही कंधों और घुटनों से टकराते हुए….. लेकिन बहनह में नहीं मिली रही…..
दुपट्टे को अपने हाथों में कस लेना चाहा है…..
मुझे जमीन पर पटक दिया गया है…..
दुपट्टा और गरारा मुझसे दूर जा छिटका है…..
जाई,’ मैं चीख रहा हूँ, चिल्ला रहा हूँ…..
के साथ…..
के साथ…..
धब-धब ऊपर आ रहे हैं…..
कह रहे हैं, ‘भैयाजी को उनके कमरे में इधर लाओ| फौरन|’
नीचे क्यों फेंका, बाबूजी?’ मैं विलाप करता हूँ…..
पट्टी बाँध दो, खिलावन,’ मेरे पिता आदेश देते हैं|
ज़्यादा ही ठुनक रहा है…..’
स्पर्श की माया है, लाला जी,’ रिश्ते में खिलावन वैद्य जी का सगा भतीजा है और
उन्हीं की तरह मेरे पिता के संग निर्भीक बात कहने में झिझकता नहीं, ‘जो भैयाजी को
उत्पात की दिशा में प्रवृत्त कर रही है| नंदराम क्या कह गए हैं-
हैं
कहैं
अपने चाचा ही को लिवा लाओ| वही कुछ उपाय कर लें पहले…..’
फिर कुछ न पूछा|
रहा हूँ| अहोर-बहोर|
की उस दोपहर क्या जाई ही छत पर आई रहीं? अपनी मृत्यु का भेद उगलने?
जिस भेद को मेरे सहम ने मेरे चित्त की किसी परत में पीछे धकेल दिया था, उस दोपहर
वह अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ था?
झूठा
एक टीस
आई स्टिल लव यू पापा


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