बत्तखें
खिड़की उतरी थी|
दीवारों के बीच एक बुर्ज की भांति खड़ी|
हुई|
बाबूजी उस खिड़की पर खड़े थे|
वाले थे? क्या मैं उन्हें बचा सकूँगी?
उन्हें वहीं नीचे से पुकारा| वह नीचे आ गए| हवा के रास्ते|
सहारे कहींभीआ जा सकती हो,” वह मुझ से बोले|
पूछा|
मेरा कंधा छुआ मानो वह किसी जादुई छड़ी से मुझे छू रहे थे|
हवा पर सवार हो ली|
पूछा|
उन्हीं ने सिखाया था और उन दिनों मैं चलने से पहले हमेशा पूछती, “किधर जाएँगे?” और
उत्तर में वह मुझ से सवाल करते, ‘तुम बताओ| आज किधर जाएँ?’ दाएं? मिल्क बूथ की
तरफ? या फिर बाएं? ऊँचे पुल पर? या फिर आज सामने ही चलें? टाउनहॉल?”
निवास में रहते थे जो एक तिकोने मोड़ वाली सड़क पर स्थित था| शकुंतला बाबूजी की पहली
पत्नी थीं| उनके इकलौते बेटे, अरुण भैया की तथा पहली दो बेटियाँ – कृष्णा जीजी तथा
करुणा जीजी – की माँ|
बाबूजी हँस पड़े|
कर मैंने पुरानी एक ज़ेन कहावत बोल दी, “आकाश खटखटाएँ और उसकी आवाज सुनें…..”
पूछा, ‘कौन-सा परलोक खोलूँ?’ तो क्या कहोगी…..”
हम बाप-बेटी ने अपने विषय-भौतिकविज्ञान-में एक शोध निबंध तैयार किया था-
यूनिवर्स एंड मल्टीवर्स(ब्रह्मांड एवं ब्रह्मांडिकी) जिस में हमने ब्रह्मांडिकी
कीचर्चित परिकल्पनाओं एवं विचारधाराओं को प्रस्तुत किया था तथा जिन में हमारे इस
लोक के अतिरिक्त अनेक, परलोकों की उपस्थिति की बात उठायी गई थी और उसी संदर्भ में
हमने सन् १९२९ में हब्बल के टेलिस्कोप अवलोकन से सामने आए बबल्ज़ (बुलबुलों) की
परतों ब्लैक होल्ज़ (काले कुंडों) के कवकजाल से ले कर सन् अस्सी के दशक में एलेन
गूथ की इनफ़लेशनरी कौस्मौलॉजी(ब्रह्मांडिकी के फैलाव) के अंतर्गत उत्पादित हो रहे
कॉस्मिक फ़्युल अंतरिक्षीय जलावन के कारण ब्रह्मांडिकी परलोकों की चर्चा की थी|
माँ को देखे-सुने मुझे अठारह वर्ष होने जा रहे थे|
पृष्ठ उलटने-पलटने थे| नए-पुराने, अगले-पिछले|
मृत्यु का वरण उन्होंने बाबूजी और मेरी अनुपस्थिति में कैसे और क्यों कर लिया था?
उस रात बाबूजी शहर से बाहर थे| अपने गाँव पर| वहां की अपनी पैतृक संपत्ति का निपटारा
करने के निमित्त और मैं मीलों दूर पड़ने वाले एक-दूसरे शहर के कॉलेज के छात्रावास
में थी, जहाँ बाबूजी ने मुझे भेज रखा था| परिवार में निरंतर बढ़ रहे तनाव से मुझे
अलग रखने के वास्ते|
मानसिक संस्तभ लेकर परिवार में सब से बाद में आने वाली छुटकी पहले से कहीं बेहतर स्थिति
में है, अनियमित समतोल एवं विषम बौद्धिक स्तर के बावजूद| अपने आइ-पैड पर वह मनपसंद
संगीत सुनती है, फिल्में देखती है, विडियो गेम्ज़ खेलती है| उसके पास अपना एक पिआनो
भी है, जिसकेपैडल पर अपने पैर जमा कर वह उसकी तान बखूबी घटा-बढ़ा लेती है| कभी
ख़ालिस अपने मनोरंजन के लिए तो कभी अपनी मनःस्थिति मुझ तक पहुँचाने को|
तक अभी पहुँची नहीं,” बाबूजी गंभीर हो गए, “न जाने किस परलोक में है? किस आकाशगंगा
में? किस सूर्यमंडल में? किस बबल में? किस काले कुंड में? किस वृत्त में?”
कोई करतब नहीं दिखा रही?” मैं भी गंभीर हो चली|
के अनुसार परिवर्ती हमारे आकाश और अंतरिक्ष में तिहत्तर प्रतिशत ऊर्जा विकर्षण के
सिद्धांत पर काम करती है और बिग बैन्गज द्वारा गढ़े जा रहे नए परलोकों को एक-दूसरे
से दूर रखने के लिए उत्तरदायी है और इसी विकर्षण-शक्ति की पूरी जानकारी प्राप्त
करने में अभी तक असमर्थ रहे इन विज्ञानियों ने इसे ‘डार्क एनर्जी (अज्ञात ऊर्जा)
का नाम तो दे ही रखा है, साथ ही वे इसे ‘डक’ (बत्तख) भीकहा करते हैं, इफ़ इट वॉक्स
लाइक अ डक एंड क्वैक्स लाइक अ डक, इट प्रौबब्ली अ डक…..’ यदि यह ऊर्जा एक बत्तख की
भांति अकड़ कर चलती है और फिर अपनी टर्र-टर्र रटती रहती है तो फिर यह एक बत्तख ही
है|
बाबूजी ने कहा, “उधर उस बत्तख ने अपनी डार्क एनर्जी के कारण करतब दिखलाए थे तो इधर
यह अपना काम दिखा रही है…..” हम बाप-बेटी ने अरुण भैया की पत्नी, शशि को बत्तख
का नाम दिया हुआ था उनकी दुर्बोध एवं संदिग्ध प्रकृति के कारण| जिसे उन्होंने घर
में प्रवेश पाते ही उद्घाटितकर डाली थी मेरे उस सोलहवें साल में|
एल्बम से शशि भाभी ने शकुंतला आंटी की एक तस्वीर निकाली थी और उसे बड़े आकार में
फ्रेम करवा कर बैठक में टांग दी थी| घर आए सभीआगंतुकों को बोलने के वास्ते, ‘घर की
असली मालकिन तो यही हैं| हमारे इस निवास की शकुंतला| अपने पिता की इकलौती संतान
थीं| बड़े चाव से उन्होंने यह हवेली बेटी के नाम पर तैयार करवाई थी| दहेज़-स्वरुप
उन्हें भेंट दी थी| क्या जानते थे शादी के बारहवें साल ही में बेटी को कैंसर लील
ले जाएगा और घर की एक मामूली नौकरानी नई मालकिन बन बैठेगी…..”
वह भी इस बड़ी बत्तख ने कहीं छिपा रखी हैं?” शकुंतला आंटी से मिलने की भी मेरे अंदर
एक तीखी चाह थी| माँ से मैंने सुन रखा था वह बाबूजी को बहुत प्रिय थीं! माँ को इस
घर में वह लाई थीं, बाबूजी के गाँव से, अपनी बीमारी के दौरान, बच्चों की देखभाल के
लिए और बाबूजी के मन में माँ की जगह बनाने के पीछे भी उन्हें बच्चों की चिंता रही
थी| उस समय अरुण भैया दस वर्ष के थे और दोनों जीजी लोग आठ-आठ बरस की| जुड़वाँ होने
के कारण दोनों हम उम्र थीं|
मैंने बताना था, बाबूजी ने माँ को अपनी दूसरी पत्नी बनाने में अधिक समय नहीं
गंवाया था| भैया और जीजी लोग ने भी उन दोनों की विवाहित अवस्था को सहर्ष स्वीकार लिया
था और गाड़ी ने अपनी गति बढ़ा दी थी| गाड़ी में मेरी प्रविष्टि हुई थी दूसरे वर्ष और
छुटकी की आठवें वर्ष| बाबूजी के संरक्षण में हम दोनों ही को गाड़ी में यथेष्ट स्थान
दिया गया था और गाड़ी ने अपनी यथोचित गति बनाए रखी थी| गाड़ी को ब्रेक आन लगाया था
शशि भाभी ने| यथापूर्व चल रही हम माँ-बेटियों की स्थिति ऐसी घुमाई थी कि परिवार
में गहरे भेद उत्पन्न हो गए थे, सौतेलों और सगों के, और तो और हमारे समर्थक एवं
संरक्षक होने के नाते बाबूजी को भी बेगानों की श्रेणी में ला खड़ा किया था| उनसे
उनकी गाँव वाली पैतृक संपत्ति से तो अपने-अपने हिस्से की मांग की ही थी, साथ ही
आगे-पीछे हुए जीजी लोग के विवाह संपन्न हो जाने पर शकुंतला-निवास को एक प्लाजा में
बदल डालने का सौदा भी पक्का कर लिया था, बिना बाबूजी की जानकारी के|
पता नहीं” बाबूजी के स्वर में गहरी हताशा उतर आई, “लगता है बड़ी बत्तख उसे भी इतनी
दूर ले गई है कि मैं कितना भी खगोल क्यों न खंगाल लूं वह मुझे नहीं मिलने वाली…..”
बत्तख माँ को हमसे दूर पहुँचा आई थी एक ही रात में,” प्लाजा वाले बिल्डर को माँ से
मिलवाने के लिए शशि भाभी ने वही रात चुनी थी जब माँ के पास अपनों के नाम पर केवल
छुटकी रही थी और वह यह आघात झेल नहीं पाई थीं|
ली थी,” बाबूजी की आवाज रूँआसी होचली, “हमें शकुंतला-निवास छोड़ देना पड़ा था जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के पैंतालिस वर्ष गुजारे थे|
खगोलज्ञऔर गणितज्ञ बेशक बोलते रहें इहलोक में,
हमारी इस पृथ्वी में डार्क एनर्जी नगण्य मात्रा में है और इसीलिए हमारी यह सृष्टि सबलिए है: चाँद-तारों और पिंड-सूरजों से लेकर पशु-पक्षीऔरफूल-पत्तीकेसाथ-साथ अपनी यह मनुष्य जाति भी|
जो उन दूसरे पर लोकोंमें कहीं नहीं लेकिन हम बाप-बेटी जानते हैं इसी मनुष्य जाति के अंदर
कुछ लोगों में डार्क एनर्जी के कैसे-कैसे भंडार भरे पड़े हैं…..”
बाबूजी,” मैं व्याकुल हो उठी|
कहाँ से दे पाऊँगा? मानव प्रकृति का भी हमारे खगोल की भांति, कोई ओर-छोर नहीं, कोई
बांध नहीं, कोई चौहद्दी नहीं…..”
एक चौहद्दी रखता है, अंत रखता है और यह अंत भी अचानक आ टपकता है| तुम्हें ब्याहने
की मैं सोच रहा था जब ऊपर वाली बत्तख मुझे तुमसे दूर ले गई| पंजाबी में एक टप्पा
है न, कैंठे वाला आ गया परौहना, नी माए तेरे कम न मुक्के (गले में माला डाले अतिथि
दरवाजे पर आ पहुँचा है, मगरअरी माँ तेरे काम अभी भी बाकी हैं…..)”
तो सभी काम पूरे किए हैं| मुझे डॉक्टरेट करवाई है, यूनिवर्सिटीकी नौकरी के योग्य
बनाया है…..”
तो नहीं दिला पाया| छत्तीस साल की अपनी इस उम्र में तुम आज भी अविवाहित हो, सिंगल
हो…..”
जरूरत महसूस ही नहीं हुई बाबूजी| फिर परिवार में छुटकी है जिसे देखने के लिए अब
मैं ही बची हूँ|”
बाबूजी हम बहनों से विदा हो लिए थे|
चमत्कार था जो उस रात हम बाप-बेटी एक-दूसरे के इतने पास आ गए थे|
ही|
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