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वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धरवाहिक कहानी -बिटिया भाग 1

वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह जी की लेखनी गंभीर विषय उठाती रही है । फिर चाहें उनकी बहु चर्चित पुस्तक ‘सिताबोबाई’ हो या “सिन्हा बंधु” । जेलर की डायरी के पन्ने पर आधारित उनकी शृंखला आप पहले भी अटूट बंधन में पढ़ चुके हैं । इस बार पढिए माँ और ममता के विविध प्रसंगों को सहेजती उनकी उनकी सामाजिक मार्मिक कहानी “बिटिया” । प्रस्तुत है इस धारावाहिक कहानी का पहला भाग –

वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धरवाहिक कहानी -बिटिया 1

 

अगस्त का महीना,झमाझम बारिश हो रही थी,बिजली कड़क रही थी,जैसा हमेशा होता है,इधर बिजली कड़की उधर घर की बिजली गुल हो गई ।घनघोर अंधेरा छा गया ।इसी समय फ़ोन घनघनाने लगा,किसी तरह टार्च की रोशनी में फ़ोन उठाया-उधर फ़ोन पर परेशान रूमा की आवाज़ आई-फ़ौरन आ जाओ।बहुत ही ज़रूरी काम है ।

 

रजनीश भी उठ गए-क्या बात हो गई,मैं चलूँ ।

 

मैंने कहा पता नहीं क्या बात है,आवश्यक होगा तो बुला लूँगी ।मैं कन्हैया के रिक्शे से चली जाऊँगी ।वह संभाल कर ले जाएगा ।

 

मेरी और रूमा की स्कूल के ज़माने की दोस्ती है।वह क्लास में आगे से प्रथम रहती,मैं पीछे से ।जब वह मैथ्स और फ़िज़िक्स के सवाल हल करने में मशगूल रहती,मैं पीछे बैठ कर उपन्यास और कविताओं में डूबी रहती ।वह पी एम टी में टाप कर डाक्टर बन गई,आज शहर की मशहूर स्त्री रोग विशेषज्ञ है।मैं भी लेखन के कारण पेपर में कालम लिखने लग गई ।

 

उसने शादी के बाद बड़ा मकान ले लिया,सामने क्लीनिक और पीछे नर्सिंग होम जो आवश्यक मरीज़ों के लिए था ।समय निकाल कर एक प्राइवेट अस्पताल में भी जाती थी ।

 

मेरे पति को सरकारी आवास मिला था ।अंग्रेजों के समय का बंगला,आगे पीछे बहुत जगह थी ।पीछे दो सर्वेंट क्वाटर थे।एक में गोपाल जो खाना बनाता और माली का काम करता था ।

 

दूसरे में कन्हैया लाल जो रिक्शा चालक था,उसकी पत्नी राधा बंगले की झाड़ू पोछा और बर्तन धोती ।

 

शादी के इतने साल बाद भी दंपति निस्संतान थे।

 

गोपाल अक्सर छेड़ा करता-का हो कन्हैया कब पापा बनब ।

 

कन्हैया की पत्नी राधा हाथ नचा नचा कर लड़ती -जब भगवान देंगे ।तू काहे फ़िक्र करता है ।

गाहे-बगाहे मैं कन्हैया के रिक्शे पर जाती।

 

मुझे सबसे ज़्यादा सुरक्षित लगता।वह सड़कों के गढ्ढे से बचा कर ले जाता।हर साल सड़क की मरम्मत की जाती,एक बौछार में धुल जाती।सड़क का अलिखित संदेश था संभलकर चलना आपका काम है।टूटफूट की ज़िम्मेदारी महापालिका की नहीं है।मैं कई बार अपने पत्र में इंगित कर चुकी थी,बस लिख ही सकते हैं ।

 

कन्हैया धीरे धीरे रिक्शा चलाता,और खड्डों से बचा कर निकालता।ये बात दूसरी है किपूरे रास्ते बोलता रहता।

 

उस बरसती रात में मैं कन्हैया के रिक्शे पर निकली।मैं तो हुड के नीचे बौछारों से थोड़ा बहुत भीगी,पर कन्हैया तो तर-बतर हो गया ।

 

डा रूमा के नर्सिंग होम पहुँच कर मैंने उसे बरामदे में बैठने के लिए कहा ।अब इतनी रात कहाँ जाता ।कदाचित मैं भी रिक्शे से लौटती। लिहाज़ा वह कोने में बेंच पर बैठ गया।

 

मैं अंदर चली गई,शहर के जाने माने रईस दंपति बैचेन परेशान खड़े थे । मेरे अभिवादन का उत्तर नहीं दिया ।कदाचित मुझे देख विचलित हो गए ।

 

पर्दे के पीछे से कराहने की आवाज़ आ रही थी।रूमा मुझे लेकर फ़ौरन दूसरे कमरे में चली गई ।पहचाना इन्हें ।

 

हाँ ,बजाज ,बड़े बिज़नेस मैन हैं ।

 

अंदर इनकी इकलौती बिटिया है।

 

क्या हो गया-मैंने चिंतित होकर पूछा ।

 

कुछ नहीं,जमाने की नयी हवा लग गई ।इसका विवाह मर्चेंट नेवी के अधिकारी के संग तय हो गया ।धूमधाम से सगाई हुई ।तय हुआ कि छ  महीने बाद जब कैप्टन शिप से लौटेंगे,तब विवाह होगा।

 

सगाई हो चुकी थी,दोनों पक्षों ने साथ घूमने फिरने पर एतराज़ नहीं किया ।नये ज़माने की हवा बह चली।

 

दोनों भूल गए कि सगाई हुई है,विवाह नहीं ।

 

एक दिन सीमा के बंधन टूट गए ।लड़का शिप पर चला गया,वहाँ से अपने माता पिता को सूचना दी-लड़की सही नहीं है,विवाह से पहले जो समर्पण कर दे,उसका चरित्र सही नहीं होगा ।

 

वरपक्ष ने अपने पुत्र को सही ठहराया और संबंध तोड़ दिया ।कितना आसान होता है संबंध जोड़ना और तोड़ना।

 

संबंध तो टूट गया पर गलती का परिणाम बढ़ने लगा ।घबरा कर बजाज मेरे पास पहुँचे ।इतना समय बीत चुका था सो गर्भपात संभव नहीं था ।

 

अंदर वही लड़की अपनी गलती की सजा भुगत रही है ।चीखें बढ़ती जा रही थी ।

रूमा ने पूछा- बच्चे का क्या किया जाए ।

 

तू सोशल है,अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ा ।

 

बच्चे को अनाथालय में दे दिया जाय।-मैंने कहा ।

 

हट,पागल बहुत पूछताछ होगी ।बदनामी भी ।

 

मेरे दिमाग़ की बत्ती जली-किसी निस्संतान दंपत्ति को चुपचाप दे देते हैं ।

 

इतनी रात को निस्संतान दंपत्ति कहाँ ढूँढने जायें।तेरे अख़बार में विज्ञापन दें,इडियट।

 

बजाज क्या कहते हैं-मेरा सवाल था ।

 

वे लोग कह रहे हैं कूड़े के ढेर पर फेंक दो,यानि मृत घोषित कर दो।तू सोच,इसीलिए बुलाया है ।मैं अंदर सिस्टर की मदद के लिए जा रही हूँ ।बस उसी को रोका है,बहुत विश्वसनीय है।

 

बच्चे के क्रंदन से नर्सिंग होम गूंज उठा,बजाज दंपत्ति का बस चलता तो धरती में समा जाते।मारे शर्म के शुतुरमुर्ग की तरह सिर झुका लिया ।इतनी आज़ादी उन्होंने ही दी थी।

 

सिस्टर ने कपड़े में लिपटी प्यारी बिटिया मेरी ओर बढ़ाई।बजाज ने मुँह फेर लिया ।

 

कुछ फ़ैसले ऊपर वाला करवाता है,मैंने बाहर आ बंडल कन्हैया लाल को थमा दिया-तुम्हें बच्चा चाहिए था,इसे लो।

 

कन्हैया ने प्यार से थाम लिया,पीछे से रूमा का कठोर स्वर सुनाई दिया-लेकर फ़ौरन निकल जाओ,किसी को भी कानों कान ख़बर नहीं होनी चाहिए ।

 

सिस्टर उम्रदराज़ और सुलझी हुई थी,उसने बच्चे के लिए दूध भरी बोतल दी,ताकीद की-दो दो घंटे बाद पिलाते रहना।

 

कन्हैया ने बच्ची को सीने से चिपटा लिया,फ़ौरन निकल गया कि कोई उसके ख़ज़ाने को छीन न ले।

 

हम दोनों चुपचाप शांत बैठ गए ।सिस्टर ने बजाज को अपनी निढाल बेटी को ले जाने में मदद की ।

 

इतनी बड़ी घटना स्वप्न सरीखी लग रही थी ।

 

पौ फटने लगी,मैं दुःस्वप्न से जाग उठी।मुझे उठते देख,रूमी खुद मुझे छोड़ने आई।रजनीश ने ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई ।चुपचाप चाय का कप पकड़ा दिया ।

उसी रात कन्हैया ने सर्वेंट क्वाटर ख़ाली कर दिया ।पौ फटने से पहले दोनों पति पत्नी चले गए ।पड़ोसी गोपाल तक को पता नहीं चला,आकर पूछा-कन्हैया रात बिरात कमरा ख़ाली कर चले गए ।सामान भी छोड़ गए ।न जाने का बात हो गई ।

 

मैंने अनजान बनकर कहा-हो सकता है गाँव से कोई खबर आई हो,तभी जल्द बाज़ी में चले गए होंगे ।

 

अरे मैडम,हम तो बग़ल में ही थे,जगाकर बता देते,पता नहीं रुपया पैसा पास रहा कि नाहीं।हम कुछ मदद करते।

 

उफ़,मेरा दिमाग़ भी इस ओर नहीं गया।कुछ पैसे तो देने चाहिए थे ।मन अपराध बोध से ग्रस्त हो गया ।

 

रजनीश ने पूछा-कुछ लेकर नहीं गए ।

 

नहीं साहब,बिस्तर,खटिया और चाँदी के बर्तन सब छोड़ दिया

 

चाँदी के बर्तन-रजनीश को आश्चर्य हुआ ।मैंने कहा -एल्मुनियम के बर्तन ।रजनीश फ़ैक्ट्री जाने के लिए तैयार होने लगे।

 

इतनी जल्द बाज़ी में लिया निर्णय मुझे चुभने लगा।रूमा ने मुझे ख़ामोश रहने को कह दिया ।

क्रमश :

आशा सिंह

आशा सिंह

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