वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी बिटिया 5
मुझे हंसी आ गयी-भला क्यों ।
मैडम जी,बोर्ड पर पढ़ें रहे।
और वर्मा कैसे लगाये ।
ऊ साहब की नेम प्लेट याद रही।
यानि दो नेम प्लेट याद रहे ।आगे बताओ ।
सुरेश की पत्नी बोली- हम कुछ बर्तन देते हैं,आज तो हमारे रसोई में खा लें।
हम दोनों ने अपनी पूँजी टटोलने के बाद कुछ बर्तन,चटाई और बिटिया के लिए छोटा गद्दी ।
रात का भोजन सुरेश के परिवार के साथ किया ।
पार्वती बोली-बहन कल से हमारे लिए परेशान न होना,मैं अपनी रसोई कर लूँगी,बिटिया को बार बार दूध चाहिए ।साक्षात भगवान जैसी मदद की ।
सुरेश बाहर पान खाने गए,हमको भी ले गये।आप तो जानती है कि हम न पान खायें न तंबाकू ।
बातचीत हुई- कानपुर में क्या करते थे ।
भैया,रिक्शा चलाता था ।
पैडल वाला।
सुरेश ने सलाह दी- ऐसा करो आटो चलाना सीख लो ,हम आटो किराए पर दिलवा देंगे ।
मुझे आश्चर्य में डूबा देख कर पूछा- कभी स्कूटर चलाये हो ।
हाँ,पड़ोसी गोपाल का स्कूटर चलायें हैं ।
कुछ अंटी ढीली करो,बाबू से लाइसेंस बनवा दूँगा ।1200/रुपये में लाइसेंस बन गया ।सुरेश ने दो चार बार प्रेक्टिस करवायी और मुझे पास कर दिया ।
भैया,मुम्बई में भीड़ बहुत है,वैसे हमारे साहब कहते हैं कि जो कानपुर में गाड़ी चला ले,वह हर जगह चला सकता है ।सुरेश ने कहा-भैया तुम पान सुपारी गुटखा तो खाते नहीं हो,हमें तो लत लग गई है ।दिनभर खैनी मुँह में दबाये रहते हैं,जगह जगह पिच्च पिच्च कर थूकते हैं,सवारी एतराज़ करती है,एकाध बार पुलिस का डंडा भी खा गए ।तुम हमारा आटो चलायें ।
आप क्या करेंगे ।
हमें एक बिल्डिंग की चौकीदारी मिल रही है,रात को ड्यूटी,दिन में घर में सोयेंगे ।बात पक्की हो गई ।
हमने दिन भर आटो चलाया,शाम को सारे रुपये सुरेश भाई को दे दिया ।पूरे 800/,सुरेश की पत्नी चौंक गई-अच्छी कमाई किये।ये तो 300/से ज़्यादा कभी नहीं लाये।
अच्छा भागवान चुप करा,बेचारा थक मांद कर आया है,उसने आधा पैसा हमें दे दिया,आधा आपकी मेहनत और आधा आटो की मेहनत का ।
और तेल।सुरेश की पत्नी चतुर थी।
वो हम डलवा दूँगा ।
नहीं,उसमें भी आधा ।मैं खुश होकर अपने कमरे में आया-बिटिया भागों वाली है,मैंने बिटिया को गोद में लेना चाहा,पार्वती बरज दी- पहले हाथ धोकर आओ।हाँ पैसे देख बड़ी खुश हुई।सौ रुपये अलग रखा,बिटिया का है।बाज़ार से सौदा सुलफ लाये।
हमारे व्यवहार से सवारी बहुत खुश थीं,खास स्कूल जाने वाली बच्चियों की माँ ।मैं बहुत संभाल कर बच्चों को ले जाता ।ऐसी ही मेरी बिटिया भी स्कूल जायेगी,कल्पना के पंख उड़ने लगे।
पार्वती बोली- हम बोले कि हम भी एकाध घर में चौका बर्तन का काम पकड़ लें,पर डाँट दिये- ख़ाली घर में बिटिया को देख-भाल करो।
बिटिया ठुमक ठुमक चलने लगी,हमको पापा इनको मम्मी कहने लगी।जब एक बरस की हुई तो पार्वती के बहुत रोकने पर भी जन्मदिन मनाया ।इनका विचार था कि बिटिया के लिए पैसा जोड़ा जाय।
एक दिन पार्वती पैसे जोड़ी और कहा- हम लोग भी आटो ले सकते हैं ।सुरेश भाई की मदद से आटो ख़रीद लिया ।सुरेश भाई का आटो हम चलाते,हमारा किराया लाता
बिटिया तीन साल की हुई और हम भी तीन आटो के मालिक बन गए,न पान न बीड़ी न पीना,ऊपर से पार्वती बहुत हिसाब से चलती।
एक बैंक बाबू की बिटिया भी हमारे आटो से जाती।बाबू हमसे अच्छी तरह बात करते,एक दिन सलाह दी -बैंक में खाता खोलने की ।उनकी मदद से बैंक में खाता खुल गया,और बिटिया के लिए बच्चों वाला खाता ।
बैंक बाबू की सलाह पर हमने थोड़ा पैसा अपना और बैंक से लोन लेकर आदित्य बिल्डिंग में एक कमरे का फ़्लैट ले लिया ।बिटिया बड़ी हो रही थी,अच्छा वातावरण चाहिए था ।
अब उसका दाख़िला स्कूल में करा दिया ।अपना स्कूल ड्रेस पहन कर स्कूल जाती ।हम अपनी आटो से ले जाते,साथ में चार पाँच गिलहरियाँ भी चहकते हुए जातीं ।स्कूल से लौट कर अपना सारा सामान जूते मोज़े,बस्ता ठीक जगह पर रखती।ज़ेहन में रूमा याद आ गयी,वह भी इसी प्रकार अपनी चीज़ें रखती थी,मजाल है कि किसी कापी का पन्ना मुड़ जाये।डाक्टर बनने के बाद भी यही आदत रही,सिस्टर पर नहीं छोड़ती,एक एक सामान अपनी देख रेख में रखती।मुझे बताया कि सरकारी अस्पताल में डाक्टर ने सीजेरियन आपरेशन के बाद रूई का फाहा गलती से छोड़ दिया,बाद में इंफ़ेक्शन से मृत्यु हो गई ।
सुरेश का साला गाँव से लौट आया,खोली उसे मिल गयी।हमसे बोला कि मैकेनिक का काम सीख लिया है ।हमने थोड़ी जगह लेकर ‘रूमा सर्विस सेंटर ‘खोल दिया ।वह गाड़ी ठीक करने लगा,बीच बीच में मैं भी जाकर करता।
मैडम नाम और काम चल निकला ।मेरी बिटिया सरस्वती और लक्ष्मी का वरदान थी।पढ़ने में हमेशा क्लास में प्रथम आती।ट्युशन के लिए मना कर दिया-पापा,हम अपने आप पढ़ेंगे ।
हम दोनों मियाँ बीबी करिया अच्छर भैंस बराबर ।बिटिया इतनी होनहार ।
हम बड़े महँगे स्कूल में भर्ती कराये,जहां बड़े घरों के बच्चे आते थे,बिटिया को चिढ़ाते- रिक्शा वाले की बेटी ।पर रिज़ल्ट आते ही मुँह पर ताला लग जाता ।
टीचर प्रिंसिपल सब बिटिया की बड़ाई करतीं ।माँ पर इतना बढ़िया निबंध लिखा,कि पूरे स्कूल में पढ़ा गया ।बहुत सारी मम्मी रोने लगी ।कन्हैया भी सुनाते हुए रोने लगा।पार्वती सुबकती रही।
बात आगे बढ़ी,बोला -हम सोचा कि यहाँ सब बड़े घरों के बच्चे पढ़ते हैं,सबको मालूम है कि पापा का जमा जमाया कारोबार मिल जायेगा ।
हमको पता चला कि कि एक सरदार जी जो डी पी एस स्कूल से सेवानिवृत्त हो चुके थे,होनहार छात्रों के लिए स्कूल खोला है ।वहाँ केवल चुनिंदा कुशाग्र बच्चे ही प्रवेश पा सकते थे ।
सरदार जी अस्सी वर्ष के बड़े रौबदार और कड़कदार थे।बिटिया ने प्रवेश परीक्षा पास कर ली।
सरदार जी ने कहा- कन्हैया लाल जी,हमारे यहाँ पाँचवीं कक्षा में ए और बी सेक्शन हैं,ए में जो टाप करता है,उसे बी सेक्शन में भेजा जाता है ।और मैं पचास हज़ार रुपये टापर को देता हूँ,आख़िर हमारे विद्यालय का नाम रोशन करेगा।
हम बिटिया को नये स्कूल पहुँचाने लगे,एक दिन सरदार जी ने हमें बुलाया और बधाई दी-बिटिया ने टाप किया ।क्यों न करें जब इतने फ़्रिक करने वाले पिता मिले।पचास हज़ार का चेक दिया,जिसे मैंने बिटिया के खाते में जमा करवा दिया ।
सरदार जी को देखकर मेरा भी मनोबल बढ़ा,बच्चियों के लिए छोटी बस ले लिया ।और बच्चों को स्कूल पहुँचाने लगा ।सरदार जी बहुत खुश हुए-कन्हैया लाल जी,बच्चियाँ हैं,ड्राइवर सही होना चाहिए ।
मैं समझ गया कि उनका इशारा किस ओर था ।हमने उन्हें आश्वासन दिया कि सारी बच्चियाँ हमारी बेटी हैं ।हम स्वयं साथ रहेंगे ।
बिटिया दसवीं में सारे ज़िले में टाप की।सब लोग बहुत खुश,सरदार जी ने आशीर्वाद दिया-इंटर में क्या विषय लोगी।
सकुचाते हुए कहा-बायलोजी।मैं डाक्टर बनना चाहती हूँ ।
इस समय रूमा याद आने लगी,वहीं जज़्बा,बस पढ़ाई और टाप करना।उसकी प्रतिच्छाया ।भगवान क्या क्या संयोग मिलाते हैं ।
अच्छे मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिल गया ।मिला हम हॉस्टल नहीं भेजा ।बिटिया तुम चली गई तो हम दोनों कैसे रहेंगे,सो पहुँचाते रहे ।कब पाँच साल बीत गए,बिटिया डाक्टर बन गई ।
जब बिटिया को डिग्री मिली,हम दोनों भी गये थे ।प्रिंसिपल हमको बधाई दिये।
बिटिया पी जी करने लगी ।इस क्षेत्र में पुरुष ही हैं,पर चुनौती स्वीकार की ।आज इसी कारण आपके दर्शन हो गये।एक बार कानपुर गया था,पता चला आपका तबादला हो गया,बड़बड़िया गोपाल भी अपने गाँव चला गया ।
मैडम,हम कई जन्मों तक आपका एहसान नहीं भूल सकते ।
मैंने कहा-अगर जन्मों की बात है,तो पिछले जन्म में रूमा आपकी बेटी रही होगी ।अब इस जन्म में फिर मिल गई ।मिलना जुलना तो जन्मों का संयोग होता है ।मैंने तो बस कड़ी जोड़ी है ।
तब तक मोबाइल बजा-जाइए,बिटिया आपको बुला रही है ।
थोड़ी देर बाद पार्वती आई।क्या बात रही-कन्हैया ने पूछा ।
कुछ नहीं,साड़ी पहनने का शौक़ चर्राया है,वही ठीक करने गई थी ।
डा रूमा बेहद सलीके से माडल की तरह साड़ी पहन कर आई।-आंटी,आपको देख कर लगा कि साड़ी पहनूँ ।आप कितनी प्यारी लगती हैं ।
मैडम,हमेशा साड़ी पहनती हैं- पार्वती के मुँह से निकल गया ।
आपको कैसे मालूम ।-रूमा ने पूछा ।
मैंने चतुराई का लेबल चढ़ाया- अभी बातचीत के दौरान ।
कन्हैया ने कहा- चलिए मैडम आपको अस्पताल छोड़ दूँ,रूमा की भी ड्यूटी है ।
आंटी,लगता है कि हम लोग आपको पहले से ही जानते हैं ।अस्पताल में जाने कितने मरीज़ आते हैं ।
हाँ,बिटिया सही कहा।अपनी ओर की हैं,लगा हमारी दीदी हैं ।
वाह,तब तो आप मेरी बुआ जी हैं ।
बिटिया,जब अपनी ओर का कोई मिल जाता है,वही बोली वही पहनावा ,लगता है कि अपना ही है,जैसे सुरेश चाचा।
वाह,अब तो बुआ जी को रुकना होगा ।
हाँ बेटी,तुम्हारी शादी तक तो रुकेंगी- पार्वती ने आग्रह किया ।
आपरेशन सफल रहा ।रूमा ने कहा कि दो दिन बाद छुट्टी कर देंगे,आप घर ले जा सकती हैं ।आप कहें किसी सहायिका का प्रबंध कर दूँ,वह मरीज़ की घर में देख भाल कर देगी।
संभवत उसने घरवालों को परख लिया था,और मेरी परेशानी भी ।हालाँकि डाक्टर ने मेरे रात्रि को रुकने की व्यवस्था कर दी,खाना कन्हैया लेकर आते ।थोड़ी बहुत बात भी हो जाती।डा रूमा और डा प्रबोध एक दूसरे को पसंद करते थे ।हम डा प्रबोध के माता-पिता से मिल कर सगाई कर दिए ।जल्दी ही शादी के बंधन में बंध जायेंगे।सामने वाला फ़्लैट इसी वजह से लिए,साथ भी रहेंगे ।
वैसे कन्हैया लाल जी,आप डा प्रबोध को ज़्यादा मिलने नहीं देते ।
मैडम,शादी के बाद खूब मिलें,घूम फिरें,हम कुछ न बोलेंगे,पर तब बिटिया का ख़्याल रखना ज़िम्मेदारी है ।
मैंने सोचा कितने समझदार हैं ।
तब तक डा रूमा आ गयी,-बुआ जी,उन्हें होश आ गया है,आप मिल सकती हैं ।
मैं अंदर वार्ड में गई ।दीदी ने कमजोर स्वर में कहा-बस तुम ही रुकी हुई हो,बाक़ी सब चले गए ।कोई बेटा ,बहू पोता नहीं रुके।
मैंने लीपा पोती की – नहीं वे लोग तो रुक रहे थे,मैंने ही भेज दिया ।अब शादी तो रोकी नहीं जा सकती ।वे तो सुबह शाम फ़ोन कर हाल चाल लेते थे ।झूठ बोल कर तसल्ली देनी चाही।
दीदी ने अपने कृशकाय हाथ से मेरा हाथ पकड़ लिया- बासी फूल कौन सूंघता है।फेंक दिया जाता है ।मैं ही ज़बरदस्ती टहनी से चिपकी हुई हूँ ।
मेरी आँखें भर आईं,पर उन्हें समझाने की कोशिश की,उन्होंने आँखें मूँद लीं,अचानक रूमा आ गयी-हैलो बुआ जी,आप कैसी हैं ।
उन्होंने चौंक कर आँखें खोली-ठीक,आश्चर्य से देखा।
रूमा ने हंस कर कहा-ये मेरी बुआ है ,तो आप भी बुआ हुई ।वैसे आप बिलकुल ठीक है,बहुत जल्दी सौ मीटर की दौड़ में दौड़ेंगी ।हमें हंसा कर दूसरे मरीज़ के पास चली गई ।
दीदी ने प्रश्नवाचक निगाह से मुझे देखा- ये कैसी रिश्तेदारी है ।
अरे नहीं दीदी,इनके पापा कानपुर के हैं,हमें दीदी कहने लगे,सो प्यारी बिटिया बुआ कहने लगी।
माधुरी,तुम न जाने कहाँ से संबंध जोड़ लेती हों।बड़ी प्यारी लगती है ।सिस्टर ने बाहर जाने का इशारा किया ।
अब दीदी से क्या कहती,आपके संबंधी तो अस्पताल में छोड़ कर चले गए ।इसी संबंध ने तो मेरा आप का ख़्याल रखा ।
दीदी के डिस्चार्ज होने का दिन आ गया ।डा प्रबोध ने फटाफट सारे पेपर तैयार करवा दिये ।मुझे भागा दौड़ी नहीं करनी पड़ी ।काउंटर पर जा मैंने सारे बिल जमा कर दिए,रजनीश की बड़ी बहन हैं ।
कार के लिए दीदी के घर फ़ोन किया,पर सारी कारें बारातियों को लाने स्टेशन गयीं थीं ।आज ही वधू प्रवेश और रात को शानदार रिसेप्शन ।माँ कीं किसी को चिंता नहीं थी ।
मुझे परेशान देख परी आ गयी-बुआ,क्यों परेशान हैं ।
बेटा मरीज़ को घर ले जाना है,बहुत दूर कोठी है।
अरे बुआ,पापा ले जायेंगे।
मैंने गहरी साँस ली,भगवान की कृपा है ।
सहायिका ने सामान पैक किया,दीदी को व्हील चेयर पर नीचे पहुँचाया।कन्हैया ने सम्मान पूर्वक दीदी को बैठाया ।सहायिका आगे बैठी।रूमा भी ज़िद कर साथ हो ली।
क़ाफ़िला मंज़िल की ओर चला,दीदी ने भरे कंठ से कन्हैया लाल का शुक्रिया अदा करना चाहा-वर्मा जी मेरे तीन बेटों के स्थान पर रूमा जैसी बेटी होती तो क्या बात थी।आप बड़े भाग्यशाली हैं ।
कन्हैया कुछ कहना चाहता था,पर मैंने इशारा कर दिया,उन्होंने बस हाथ जोड़ दिए ।
उस समय यही बात मेरे मस्तिष्क में तैर गई- काश मैंने ही गोद ले लिया होता।पर भेद खुल जाता ।कन्हैया का भाग्य ।
कोठी के सामने बैंड बाजे बज रहे थे,स्वागत के लिए लोग तत्पर थे ।किसी ने हम पर ध्यान नहीं दिया,नव युगल नृत्य कर रहा था,लोग पैसे लुटा रहे थे ।
नगाड़ों के शोर के बीच दीदी को सहायिका और रूमा की मदद से उनके कमरे में पहुँचा दिया ।हताश दीदी चुपचाप लेट गयीं ।
मैंने धीरे से अपनी अटैची उठाई,कन्हैया को थमा दी ।दीदी हैरानी से बोली- अरे इतनी जल्दी,अभी तो नयी दुल्हन को कहाँ देखा ।
मैंने हंस कर कहा- अब दुल्हन कहाँ घूँघट में आती हैं,नीचे देख लिया ।अभी कन्हैया लाल जी हैं,एयरपोर्ट पहुँचा देंगे ।
दीदी ने कहा- शायद किसी फ़िल्म स्टार को एट होम कार्यक्रम में बुलाया है ।
मैंने धीरे से दीदी के पाँव छुए-मंत्री जी का इंटरव्यू लेने जाना है,मना नहीं कर सकती।
दीदी को शायद पुराना इंटरव्यू याद आ गया ।आशीर्वाद दिया और रूमा को प्यार ।
नीचे उतर कर रूमा ने मुँह फुला कर कहा-बुआ चींटिंग है,आप हमारी शादी से पहले जा रही हैं ।
मैंने कहा-यू नो डाक्टर,ड्यूटी पहले ।मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है।
चुपचाप एयरपोर्ट पर आ गई ।कन्हैया लाल की आँखों में आँसू थे ।मैंने पर्स खोल कर सारे शगुन के लिफ़ाफ़े उन्हें दे दिए-डा प्रबोध को दे दीजिएगा ।
रूमा फिर नाराज़ हो बोली-बुआ फिर से चींटिग ।
मैंने उसे गले लगा लिया और चेन पहना दी।बेटी फिर मिलेंगे ।अंदर से देखा,दोनों पिता पुत्री चुपचाप टकटकी लगाए मुझे देख रहे थे ।मैंने हाथ हिलाया।
सीट पर बैठ कर लगा मनों भार उतर गया ।हमेशा अपने को दोषी ठहराती थी,कि मैंने रिक्शा चालक को बिटिया देदी ।
इंटरव्यू बहुत अच्छा रहा ।मंत्री जी भी खुश हुए ।
संपादक जी ने पूछा-कब लौट रही है ।
मैंने कहा- कुछ दिनों के लिए जर्मनी जा रही हूँ ।
इतना प्यार और अपनापा मिला,उसे लुटाना भी था।अपने बेटे और उसके बच्चों पर ।
एक हाथ से ले,दूसरे से दे।
आशा सिंह

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