अटूट बंधन
कहाँ हो -मै बैंक /डाक घर में हूँ
संजय वर्मा ‘दृष्टि ‘ पुराने 500 व 1000 की करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं होने के बाद नए 500 व् 2000 …
सोनम , आयशा या एरिका – आखिर महिलाओं की सरेआम बेईज्ज़ती को कब तक मजाक समझते रहेंगे हम
वंदना बाजपेयी अभी कुछ दिन पहले जब सोशल मीडिया देश नोट बंदी जैसे गंभीर मुद्दे पर उलझा हुआ था | …
समीक्षा – “काहे करो विलाप” गुदगुदाते ‘पंचों’ और ‘पंजाबी तड़के’ का एक अनूठा संगम
हिंदी साहित्य की अनेकों विधाओं में से व्यंग्य लेखन “एक ऐसी विधा है जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं और सबसे …
दीपावली पर जलायें विश्व एकता का दीप
– डॉ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ (1) कितने भी संकट हो प्रभु कार्य समझकर विश्व …
फीलिंग लॉस्ट : जब लगे सब खत्म हो गया है
आज मैं लिखने जा रही हूँ उन तमाम निराश हताश लोगों के बारे में जो जीवन में किसी मोड़ पर …
“अंतर “- अभिव्यक्ति का या भावनाओं का – ( समीक्षा – कहानी संग्रह : अंतर )
सही अर्थों में पूछा जाए तो स्वाभाविक लेखन अन्दर की एक बेचैनी है जो कब कहाँ कैसे एक धारा के …
ये तिराहा हर औरत के सामने सदा से था है और रहेगा –
” तिराहा “एक ऐसा शब्द जो रहस्यमयी तो है ही सहज ही आकर्षित भी करता है | हम सब अनेक …
डॉ. रमा द्विवेदी के साहित्य में “भविष्य की नारी कल्पना” – शिल्पी “मंजरी”
“स्त्री विमर्श” एक ज्वलंत विषय के रूप में प्राचीन काल से ही किसी न किसी बहाने, प्रत्यक्ष या परोक्ष परिचर्चा …
हिंदी दिवस पर विशेष – हिंदी जब अंग्रेज हुई
वंदना बाजपेयी सबसे पहले तो आप सभी को आज हिंदी दिवस की बधाई |पर जैसा की हमारे यहाँ किसी के …
शिक्षक दिवस पर विशेष :मैं जानता था बेटी….( संस्मरण )
डॉ . भारती वर्मा ‘बौड़ाई ‘ ये तब की बात है जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ती थी। …
शिक्षक दिवसपर विशेष : गुरू चरण सीखें
बैठ कर हम गुरू चरण सीखे सभी मान दे कर गुरू को सदा पूजे सभी ज्ञान की नई विधा सीख …
पति -पत्नी के बीच सात्विक प्रेम को बढाता है तीज
विवाह की बस एक गाँठ दो अनजान – अपरिचित लोगोंको एक बंधन में बांध देती है जिसमें तन ही नहीं …
कुछ चुनिन्दा शेर
मेरा मशवरा है यही की तोड़ दो उसे जिस आईने में ऐब अपने दिखाई न दें कहती है मेरे साथ कब्र …
सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,
सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,पर,कदम अपने कभी डगमगाए नहीं।बदचलन है जमाने की चलती हवा,इसलिए दीप हमने जलाए …
जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है
जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है अंधेरों से भी दोस्ती होने लगी है चमकते उजालों से लगता है डर …
विचार मनुष्य की संपत्ति हैं
ओमकार मणि त्रिपाठी प्रधान संपादक – अटूट बंधन एवं सच का हौसला जिस हृदय में विवेक का, विचार का दीपक …
लघुकथा – कला
तुम्हारा क्या … दिन भर घर में रहती हो … कोई काम धंधा तो है नहीं … यहाँ बक बक …